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एक खोज, कई विवाद और नोबेल

इस साल रसायन शास्त्र के लिए दिया जाने वाला नोबेल पुरस्कार कई तरह से हैरत में डालने वाला है। एक तो रसायन विज्ञान को लेकरपरंपरागत सोच रखने वालों को इससे आश्चर्य हुआ होगा। उन्हें यह लग सकता है कि मामलाजीवों की कोशिकाओं के डीएनए से जुड़ा है और पुरस्कार रसायन शास्त्र का दिया जा रहा है। हालांकि, आज का विज्ञान इस सोच से बहुत आगे निकल चुका है और जिसे हम जैव रसायन शास्त्र कहते हैं, वह एक ऐसा मोचा है, जहां बायो-केमिस्ट्री ही नहीं, बायो इंजीनियरिंग और बायो टेक्नोलॉजी भी एक साथ खड़े दिखाई देते हैं। इस मसले को छोड़ दें, तब भी इमैनुएल शापोतिए और जेनिफर ए बाउडना को जीनोम एडिटिंग का तरीका विकसित करने के लिए इस साल का ज नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया है, वह कई तरह से नोबेल समिति की बदलती सोच को दर्शाता है।

नोबेल पुरस्कार में आमतौर पर परंपरा यह रही है कि किसी भी खोज या साहित्यिक कृति के बाजार में आने के दशकों बाद उसका चयन इस पुरस्कार के लिए होता है। इसके पीछेसोच यहरही है कि किसी भी कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार तब दिया जाए, जब उससे जुड़े तमाम विवाद खत्म हो चुके हों। और किसी चीज के लिए किसे पुरस्कारदिया जाना है, इसको लेकर पूरी स्पष्टता बनचुकी हो, ताकि पुरस्कारपरकोई विवादनखड़ा हो।यही वजह हैकि अक्सर जब पुरस्कारलेने वैज्ञानिक मंच पर पहुंचते हैं, तब तक वे अपने सक्रिय जीवनका एक बड़ा हिस्सा पार कर चुके होते हैं। इसलिए नोबेल पुरस्कार अक्सर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार जैसा भी लगता है। हालांकि, विश्व-शांति के लिए दिया जाना वाला नोबेल इसका अपवाद रहा है। इसे लेकरहर दूसरे साल विवाद सामने आते रहे हैं।

इस लिहाज से देखें, तो शापोतिए और डाउडना की गिनती युवा । वैज्ञानिकों में की जा सकती है। – वैज्ञानिक के तौर पर इन दोनों का सक्रिय जीवन अभी बहुत लंबा रहने | बाला है। और उनकी खोज भी कोई बहुत पुरानी नहीं है।महज आठसाल पहले ही इस जोड़ी ने उस क्रिस्पर तकनीक परएक शोधपत्र लिखा था, जिसने दुनिया को जीनोमएडिटिंगका एक नया तरीका दिया। हालांकि, अभी इस बात पर विवाद है कि क्रिस्परतकनीक विकसित करने का सेहरा इन दोनों के अलावा और किस-किस के सिर पर बंधना चाहिए, क्योंकि कई और दावेदार भी है। इसीलिए जब नोबेल पुरस्कारको घोषणा हुई, तो सारे दावेदारों के नाम एक बार फिर चर्चा में आ गए।

हमें ठीक से पता नहीं कि पुरस्कार के लिए उनका चयन करते समय नोबेलकमेटी की सोचक्या रही होगी। हम इसे इसलिए भी नहीं समझ सकते, क्योंकि हम नहीं जानते कि चयन के समय उनके अन्य प्रतिस्पी कौनकौन थे? लेकिन नोबेलकमेटी ने जिस तरहसेएक ऐसी खोजको पुरस्कार के योग्य समझा, जो इस समय चर्चा में भी है और विवादों में भी, वह स्वागतयोग्य जरूर है। एक तो इसलिए भी कि विज्ञान के लिए पुरस्कार जीवन की संध्या-वेला में ही दिए जाएं, इस परंपरा को तोड़ना जरूरी था।वैसे इस बार भौतिक विज्ञान के लिए जिन तीन वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कारदिया गया है, उनमें से एक रोजर पेनरोज कुछ ही महीनों में 90 साल के हो जाएंगे, जबकि इस नदी में शामिल एक वैज्ञानिक की अ अभी महज 55 साल है।

लेकिन क्रिस्पर तकनीक के लिए नोबेल दिए जाने का फैसला एक अन्य कारण से महत्वपूर्ण है। जीन और डीएनए में बदलाव करने की तकनीक पहले भी थी, लेकिनशापोतिए औरडाउडना ने जो तकनीक विकसित की, उसने जीवों की प्रकृति में बदलाव करना काफी आसान बना दिया है। तब बह दावा किया गया था कि इससे कृषि, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव हो सकेगा।काफी हद तक ऐसा हुआ भी। बीजों वजैव उत्पादों के कारोबार में लगी कई कंपनियों ने इस तकनीक को हाथों-हाथ लिया और पिछले कुछ समय में ऐसी कई किस्मों को बाजार में उतारा है, जिनमें अधिक उपज से लेकर कीटों और संक्रमण से बचाव के लंबेचौड़े दावे जुड़े हैं। दूसरी तरफ, इसने जैव तकनीक का सिरे से विरोध करने वालोंकोएकनया गुस्सा दिया है और तमाम बेसिर-पैर के तकों के बावजूद यह आंदोलन बढ़ता हुआ ही दिख रहा है। और जब तलवारें दोनों ही तरफ खिंची हुई हैं, तब इसमें एक तीसरा पक्ष भी है। और वह है, नीति-शास्त्रियों का।मनुष्य के फायदे के लिए जीवों की प्रकृति में किस हद तक बदलाव किया जाना चाहिए, यह हमेशा से विवाद का विषय रहा है। यह विवाद दो साल पहले उस समय काफी गरम हो गया था, जब चीनके एक वैज्ञानिक ने इस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मानव भ्रूण में बदलाव किया था।तबदुनिया भरमें इसकाखासा विरोध हुआथा औरविरोध करनेवालों में शापोतिए औरडाठडना के नाम भी शामिल थे। बावजूद इसके कि उन दोनों ने ही इसके पहले तक तकनीक को लेकर उठने वाले तमाम विवादों से अपने आप को हमेशा दूर रखा। अब जब नोबेलकमेटी ने उन दोनों का चयन इस साल के पुरस्कार के लिए किया है, तब उसने इन विवादों को पूरी तरह नजरंदाज करके यह साफ कर दिया है कि उसका नाता सिर्फवैज्ञानिक खोज से है, उसके उपयोग औरदुरुपयोग से जुड़े विवादों से नहीं। इन विवादों के लिए क्रिस्पर तकनीक परदोष मढ़ना हिरोशिमा और नागासाकी के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन को कठघरे में खड़े करने जैसा भी है।