/बहुत संघर्ष के बाद मिले हक का यादगार दिन
thehnews.com

बहुत संघर्ष के बाद मिले हक का यादगार दिन

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानूनलागू होने का यह 15वां वर्ष है। यह एक ऐसा कानून है, जिसने लाखों लोगों को नागरिक अधिकार पाने और सत्ताको सच का आईना दिखाने का हक दिया है। 2005 में जिस जीवंत जमीनी आंदोलन की वजह से इस कानून की राह बनी थी, उसका नेतृत्व न सिर्फ शिक्षित अभिजात्य वर्ग ने, बल्कि देश के दूरदराज के गांवों व झुग्गी-बस्तियों के कामगारों ने भी किया था। सुप्रीम कोर्टने भी संविधानके अनुच्छेद-19 के मौलिक अधिकार के रूप में, जिसके तहत हरेक नागरिकको अभिव्यक्तिकी आजादी का हक हासिल है, इसे बरकरार रखा। वाकई, प्रासंगिक सूचनाओं के अभाव में मत तैयार करने और खुद को सार्थक रूप में व्यक्त करने की लोगों की क्षमता प्रभावित होती है। यही वजह है कि इस कानून के लागू होने के बाद से लोग उत्साहपूर्वक इसका इस्तेमाल करके सूचनाएं हासिल कर रहे हैं, ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में वे सक्रिय रूप से भाग ले सकें और सरकार कोजवाबदेह बना सकें। . हरवर्ष देश में लगभग 60 लाख आवेदन आरटीआई ऐक्ट के तहत किए जाते हैं। इसके कारण यह दुनिया में कहीं भी सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला पारदर्शिता कानून है। विश्लेषणों से पता चलता है कि आरटीआई आवेदन करने वाले अधिकतर आवेदक गरीब व हाशिये के लोग हैं, जो यह जान गए हैं कि इस कानून से वे अपने मूल अधिकार व बुनियादी हक पा सकते हैं, खासकर उस व्यवस्था में, जिसमें ऐसा कोई प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र नहीं है, जो सेवा वितरण कीनाकामियां दूरकरसके।कोविड-19 संक्रमण-काल में भी अस्पतालों में वेंटिलेटर और आईसीयू बेड जैसी चिकित्सकीय सुविधाओं की उपलब्धता जानने, और प्रवासी श्रमिकों सहित मुश्किल में फंसे लोगों तक: खाद्यान्नव सामाजिक सुरक्षा लाभ पहुंचाने के लिए इस कानून का जमकर इस्तेमाल हो रहा है।

भारत के प्रत्येक नागरिक को सरकारी फाइलों तक पहंचनेका अधिकारदेकरकानुनने उन्हें व्हिसलब्लोअर व ऑडिटरबनाया है। इसने आमनागरिककोउन लोगों पर सवाल उठाने का अधिकार दिया है, जो सरकार चलाते हैं। हालांकि, इस कानून को झटके भी लगते रहे हैं। साल 2019 में आरटीआई अधिनियम के लिए प्रतिकूल संशोधन किए गए थे।सूचना आयुक्तों को उच्च दर्जा प्रदान किया गया था। संसद के भीतरव बाहर कड़े विरोध के बावजूद आरटीआई संशोधन अधिनियम को आगे बढ़ाया गया। सरकार को देश में सभी सूचना आयुक्तों के कार्यकाल औरवेतन का निर्धारण करने की अनुमति मिल गई। दूसरी ओर, सरकारों द्वारा सूचना आयुक्तों को समय पर नियुक्त न करने से आयोगों की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है। सूचना आयोगों की रिक्तियों के कारण बड़ी संख्या में अपील या शिकायतें जमा हो जाती हैं और मामलों के निपटारे में देरी होती है, जिससे यह कानून देश की जनता के प्रति जवाबदेह होने के लिए सरकारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब होना चाहिए।

लोगों के जानने का अधिकार प्रभावित हो जाता है। सभी रिक्त पदों को भरने के सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद, केंद्रीय सूचना आयोग में आयुक्तों के 11 में से छह पद रिक्त है। राज्य सरकारेभीवएकसमान रणनीति अपनाती हुई दिखाई देती हैं, आठ राज्य सूचना आयोग बिना प्रमुख के ही काम कर रहे हैं। दो आयोग, त्रिपुरा और झारखंडतो बिना किसी आयुक्त के हैं।

हमें समझना होगा, सवाल करने का हक लोकतंत्र की पहचान है।इससे लोकतंत्र की नींव मजबूत होती है।