/बिहार में उलझे धागे

बिहार में उलझे धागे

लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान जीवन भर खुद को बजनदार बनाए रखने में कामयाब रहे। उन्होंने कभी भी अखिल भारतीय स्तर पर दलित नेता बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को आगे नहीं किया और 1989 के बाद से हर चुनाव में जीत हासिल करने वालों के साथ रहे। पासवान के निधन के बाद जो पार्टी खुद को एक बंधन में पाती है, वह हैजेडी-यू। नीतीश कुमार और उनके साथियों को सावधानी से काम करना होगा, क्योंकि चिराग पासवान उनके खिलाफ अभियान जारी रखेंगे, नीतीश कोइन हमलों से बचने के लिए खुद वहां असली खेल अपने शब्द ढूंढ़ने होंगे।

वहां असली खेल चुनाव बाद शुरू होगा,जब दल अप्रत्याशित जब दल अप्रत्याशित रूपसे अपने लिए संभावनाएं तलाशेंगे।वह पासवान की आलोचना नहीं कर सकते, क्योंकि मृत्यु के बाद बुरा नहीं बोला जाता। मुश्किल परिस्थिति है और जेडीबू को रास्ता ढूंढना है। नीतीश कुमार समय पर निर्णय लेने वाले राजनीतिज्ञ रहे हैं। वह निश्चित रूप से जान रहे होंगे कि बीजेपी और एलजेपी, दोनों की कोशिश होगी कि उनकी स्थिति से अधिक से अधिक फायदा उठाया जाए।

बिहार चुनाव कोई स्पष्ट नतीजे लेकर आता नहीं दिख रहा और शायद परिणाम उतने स्पष्ट रूप से सामने न आएं। ऐसे में, असल खेल चुनाव बाद शुरू होगा, जब राजनीतिक दल नई सरकार बनाने की कवायद में अप्रत्याशित रूप से अपनी संभावनाएं तलाशेगे।

दसवां रूप

पिछले दिनों एक प्रशंसनीय खबर पढ़ने को मिली कि इस नवरात्रि में देवी की प्रतिमा की जगह कलश की पूजा की जाएगी, ताकि लोगों की भीड़कम हो और संक्रमण से बचा जाए। यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन है। सदियों से मूर्तियों की पूजा की जाती है, लेकिन यह प्रश्न कोई नहीं उठाता कि किसलिए की जाती है? नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। ये सभी स्त्री ऊर्जा के ही विभिन्न पहलू हैं, लेकिन ये मानवीय स्त्री में नहीं देखे जाते, ये सिर्फ कवि कल्पना में हैं। दसवां रूप है वह साधारण मानवीय स्त्री, जो घर, बाहर, हर जगह मिलती है। जब तक इसकी पूजा नहीं की जाती, तब तक नवरात्रि का फल नहीं मिल सकता। मूर्ति एक प्रतीक है। दुर्गा, यानी स्त्री शक्ति का परम विकसित रूपायही शक्ति हरेक आदमी के अंदर छिपे दानवों, यानी अवगुणों को विनष्ट कर सकती है। इन प्रतीकों को समझकर यदि हम दैवीय गुण अपने भीतर लाएं, तो इनकी पूजा करने का कोई लाभ होगा। ओशो ने मूर्ति पूजा के बहुत गहरे अर्थ बताए हैं, जिन्हें समझना सार्थक होगा- ‘मूर्ति सिर्फ प्रारंभ है। एक सेतु है आकार और निराकार के बीच। पूजा का अर्थ है, हमारा पूरा ध्यान अब इस मूर्ति के रहस्य पर है। मूर्ति के गणों को जैसे-जैसे हम अपने भीतर समाते चले जाएंगे. वैसे-वैसे उससे हमारा संबंध कम होता चला जाएगा और निराकार से जुड़ता चला जाएगा। यही पूजा है। यह प्राचीन मनीषियों की गहरी समझ थी। इसलिए मूर्ति की स्थापना होती है और पूजा के बाद वह विसर्जित की जाती है।